जिन्दगी

 

 

ऐ जिन्दगी गर तू

कोरे कागज सी  होती

मै बनाता तुझपर

अपने सपनो के चित्र

उम्मीद को ब्रश बना

भरता खुशियों के रंग

सजाता तुझे अपनी आसमान

छूने की चाह से

महत्वाकांक्षा से अपनी उड़ान से

दुःख की टेढ़ी मेढ़ी

कुरूप रेखा को मिटाकर

संतुलित कर निहारता तुझे

नव रसो के रंग का मिश्रण

बनता एक नया रंग

जो परे होता

एक रस के

सप्पूर्ण अधिकार से

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